Blog


नक्ष] हालातों से हार न मानने की मिसाल

 
 

कभी-कभी जीवन छोटी उम्र में ही बड़े इम्तिहान ले लेता है। नक्ष की कहानी भी ऐसे ही साहस और संघर्ष की कहानी है। नक्ष तारा संस्थान द्वारा दिल्ली के समाजसेवी एवं संरक्षक श्री एन. पी. भार्गव जी और उनके परिवार के सहयोग से संचालित शिखर भार्गव पब्लिक स्कूल में कक्षा 1 से पढ़ रहा है और आज कक्षा 8 का विद्यार्थी है। उसकी छोटी बहन भी इसी विद्यालय में कक्षा 4 में अध्ययनरत है। कुछ वर्ष पहले उनके पिता पत्नी और बच्चों को छोड़कर कहीं चले गए—और फिर कभी लौटकर नहीं आए। उस दिन के बाद से उनकी माँ ही दोनों बच्चों की दुनिया बन गईं। घर-घर जाकर खाना बनाने का कार्य कर वे किसी तरह परिवार का गुज़ारा करती हैं। आर्थिक स्थिति इतनी स्थिर नहीं है कि एक ही स्थान पर लंबे समय तक रह सकें। बार-बार किराए का घर बदलना पड़ता है। इन परिस्थितियों में कई बार बच्चों की पढ़ाई भी प्रभावित होती है, और वे नियमित रूप से स्कूल नहीं आ पाते। परंतु इन कठिनाइयों के बावजूद नक्ष का उत्साह कम नहीं हुआ। संघर्षों के बीच पला यह बालक पढ़ाई में अत्यंत होशियार है। परिस्थितियाँ भले ही साथ न दें, पर उसके इरादे दृढ़ हैं। स्कूल उसके लिए केवल शिक्षा का स्थान नहीं, बल्कि स्थिरता, विश्वास और भविष्य की आशा है। नक्ष की कहानी हमें यह विश्वास दिलाती है कि यदि समाज का सहयोग और परिवार का साहस साथ हो, तो हर बच्चा अपने “शिखर” तक पहुँच सकता है।

 
 

संघर्ष की छाया में भी शिक्षा का उजाला

 
 

उदयपुर की एक छोटी सी किराये की कमरे वाली दुनिया में रहने वाली तनीषा और यामिनी दो सगी बहनें हैं। उम्र भले ही कम हो, लेकिन जीवन ने उन्हें बहुत जल्दी समझदार बना दिया।

तनीषा आज कक्षा 8 में पढ़ती है और उसकी छोटी बहन यामिनी कक्षा 6 में। दोनों बहनें तारा संस्थान द्वारा विधवा महिलाओं के बच्चों की शिक्षा के लिए निशुल्क संचालित शिखर भार्गव स्कूल में अध्ययनरत हैं।

इनका बचपन सामान्य बच्चों जैसा नहीं रहा।

करीब 11 वर्ष पहले, जब परिवार को सबसे अधिक सहारे की जरूरत थी, इनके पिता ने मानसिक परेशानी के कारण आत्महत्या कर ली। यह घटना पूरे परिवार के लिए एक ऐसा घाव बन गई, जो समय के साथ भी पूरी तरह भर नहीं पाया।

पिता के जाने के बाद जीवन अचानक बदल गया।
घर की जिम्मेदारियाँ, असुरक्षा और संघर्ष का बोझ एक अकेली माँ के कंधों पर आ गया।

परिवार की मदद के लिए इनके बड़े पापा ने उदयपुर में किराये पर एक कमरा दिलवाकर रहने की व्यवस्था करवाई। लेकिन जीवन की राह आसान नहीं थी।

आज इनकी माँ दूसरों के घरों में झाड़ू-पोछा करके अपने बच्चों का पालन-पोषण कर रही हैं।
हर दिन मेहनत, हर दिन चिंता…
लेकिन फिर भी उनकी आँखों में अपने बच्चों के भविष्य का सपना जीवित है।

इसी बीच किसी ने उन्हें तारा संस्थान द्वारा संचालित शिखर भार्गव स्कूल के बारे में बताया, जहाँ विधवा महिलाओं के बच्चों को निशुल्क शिक्षा दी जाती है।

आशा की एक किरण लेकर माँ ने स्कूल में संपर्क किया।
और फिर तारा संस्थान ने तनीषा और यामिनी को स्कूल में दाखिला दिया।

आज दोनों बहनें नियमित पढ़ाई कर रही हैं।
उनकी बड़ी बहन भी 3 साल पहले इसी स्कूल की आठवीं कक्षा से पढ़कर आगे बढ़ चुकी हैं।

यह कहानी केवल दो बहनों की नहीं,
यह कहानी है एक माँ के संघर्ष की,
और शिक्षा के सहारे टूटते परिवार को फिर से संभालने की।

शिखर भार्गव स्कूल उन बच्चों के लिए एक नया जीवन है,
जिनके सिर से पिता का साया उठ चुका है,
लेकिन जिनके सपनों को उड़ान अभी बाकी है।

तनीषा और यामिनी की आँखों में आज भी दर्द है,
पर साथ ही उम्मीद भी है —
कि शिक्षा उन्हें एक बेहतर कल तक ले जाएगी।

 
 
 
TOP